मंगलवार, 19 जुलाई 2011

धीरसमीरे....



धीरसमीरे....
धीर-समीर-प्रकम्पित वन-कुंजो में श्री घनश्याम.
निरख रहे थे श्री राधा का स्वर्ण-वर्ण मुख, वाम.
अकस्मात् हो गया लाल, उनके कपोल का मूल.
खींच लिया था प्रिय मृग-शावक ऩे कौशेय दुकूल.


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धीर-समीर-प्रकम्पित - धीमी हवा के कारण हिलता हुआ..
कौशेय दुकूल = रेशमी दुपट्टा
मृग-शावक = हिरन का बच्चा 
स्वर्ण-वर्ण मुख = सुनहरी आभा वाला चेहरा .

श्री राधा जी का दर्शन करने वाले भक्तो ऩे अपने अनुभव बताते हुए, उनके दृश्य - अंगो का रंग,चमकते हुए सोने जैसा बताया है.


2 टिप्‍पणियां:

  1. अहा, हिन्दी का काव्यमयी उत्कर्ष।

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  2. श्री राधा जी एवं भगवान श्री कृष्ण के प्यार की सुनहरी कविता हैं .....

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