शनिवार, 20 अगस्त 2011

आदमी बस चल रहा है.


आदमी बस चल रहा है.

यह बिना जाने
 कि जाना है कहाँ , कैसे , किधर,

वक़्त उसका बेवजह ही ढल रहा है.

आदमी बस चल रहा है.

खुद उसी की आरजू ने 
आग दिल में जो लगाईं,

वह उसी दोज़ख में बेबस ,
रात दिन बस जल रहा है.

आदमी बस चल रहा है.

-- अरविंद पाण्डेय 

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दोज़ख = नरक  

4 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं कोई तो
    पथ का उजाला,
    बनकर आता।

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  2. उत्कृष्ट ही नहीं, अति रोमांचक कविता "आदमी बस चल रहा है"........ ...

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  3. आदमी चलते चलते यदि पल भर भी रुक कर सोचे तो उसे अपना श्रम व्यर्थ जान पडेगा इसी डर से वह बस चलता ही जाता है....

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  4. कौशल किशोर24 अगस्त 2011 को 11:39 pm

    चलने की चपलता ही जीवन का आरंभ है।

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