रविवार, 24 अप्रैल 2011

पान करता था, रूप-मरंद .


मुख-कमल का बस, मैं, बन, भृंग ,
पान करता था, रूप-मरंद .
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स्वप्न :पृष्ठ ८ 
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३७
खडा था मैं आनंद-विभोर,
चपल मन के सब पट थे बंद.
मुख-कमल का बस, मैं, बन, भृंग ,
पान करता था, रूप-मरंद .

३८
 तभी, माँ,मधुराधर को खोल,
मृदु वचन बोलीं, मुझे निहार.
बह उठी थी मानों सर्वत्र,
सुधाकर से अमृत की धार--

३९  
'' क्रांत-दर्शी कवि-दृष्टि समान,
नहीं है मेरा कोई अंत.
व्यापता है बस जग में नित्य,
एक मेरा ही रूप अनंत.

४० 
''गगन के ये सुन्दर श्रृंगार,
सूर्य,तारक,एवं शशकांत.
प्राप्त कर, मेरी एक मरीचि,
सदा हंसते हैं, होकर कान्त.''

४१ 
''मधुर मेरे विहसन के संग,
मुदित हँसने लगती है सृष्टि.
तनिक, यदि',  मुझको आता क्रोध,
प्रलय की होने लगती वृष्टि .''

४२
''देखकर मेरा दिव्य-स्वरुप,
भक्ति में परिणत होता ज्ञान.
सिद्ध योगी में भी तत्काल,
सृष्ट होता मेरा संधान .''

४३
''बुद्धि-अनुशासित-मानस बीच,
सतत, मैं करती मोहक लास्य.
क्रोध-विरहित-मानव ही मात्र,
देख सकता है मेरा हास्य.''

४४
''काम-आसक्त मनुज को शीघ्र,
नष्ट करता है उसका क्रोध.
काम से मानव का राहित्य,
दान करता है उसे सुबोध .''

क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 

4 टिप्‍पणियां:

  1. उच्च कोटि काव्य ..
    मन मुदित कर देता है ...
    पुनः आग्रह है -क्लिष्ट शब्दों का अर्थ दे दिया करें .
    धन्यवाद

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  2. एक बहुत प्यारी सी मधुर मधुर मोहक कविता ...सादर

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  3. हिंदी साहित्य जगत के चमकते सितारें हैं आप। आपके लेखनी का पैनापन देखते ही बनता है । इन उत्कृष्ट रचनाओं के माध्यम से आप हिंदी साहित्य जगत की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं , इसके लिए आपको कोटिशः बधाई ! आपकी रचना में बसा सहज अध्यात्म मन को छूता है ।

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