मंगलवार, 15 जून 2010

मुझे, रह रह के मेरी माँ की याद आती है..


सुखन, जुबान से निकले तो भला क्यूँ निकले .
मेरे इक दोस्त के यहाँ साया-ए-मातम है.
दगा-गरों के सितम का है वो शिकार हुआ.
भरोसा कौन करे, किसपे , बस यही गम है.

बहुत उदास हो गयीं हैं वादियाँ , ये चमन .
नई बारिश भी जाने क्यूँ मुझे रुलाती है.
कोई पनाह, सहारा न अब तो दिखता है .
मुझे, रह रह के मेरी माँ की याद आती है.


मैंने रफ़ी साहब द्वारा गया हुआ गीत '' जब भी ये दिल उदास होता है..जाने कौन आसपास होता है..'' अपनी आवाज़ मे रिकॉर्ड कराया है..आप इसे ज़रूर सुनें और बाताये कि क्या मैं इस गीत में अपना दर्द भर पाया..


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----अरविंद पाण्डेय


( सुखन = कविता . दगा-गर = विश्वासघाती )

15 टिप्‍पणियां:

  1. मां तो बस मौन साधना है माँ.... माँ....
    माँ.... बस माँ....और कुछ नहीं हर बच्चे की पहली गुरु उसकी माँ ही होती है....संसार में सबसे बड़ा उत्तरदायित्व किसी employee या boss का नहीं बल्कि एक माँ का होता है..!!!!!,

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  2. प्रणाम ....
    बहुत हीं सुन्दर ...रचना और गाना भी ...धन्यवाद सर ..ऐसी रचना और गाना हमारे बीच लाने के लिए !!!

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  3. परम आदरणीय सर ,
    "ठंडी हवाओ में साँस चलती हो " एक मासूम सा सवाल लिये ----आपके द्वारा गाया गया यह गाना '' जब भी ये दिल उदास होता है" अपार दर्द तो सुनकर स्वतः स्पष्ट हो जाता हैं ..... आपकी यह आवाज़ दिल से निकली हुई हैं " एक मासूम सा सवाल लिये " ..... अति सुंदर ... जय हिंद

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  4. Beautifully sung. Heart touching.

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  5. परम आदरणीय सर ,
    " एक मासूम सा सवाल लिये " जो भी बच्चे जन्म लेते हैं , उन्हें कभी ना कभी तो इस दर्द से गुजरना ही पड़ता हैं , लेकिन माँ तो अपने बच्चे का ख्याल रखती ही हैं ना सर , गाना सुनने से ही पता चलता हैं की आपने अपनी आत्मा की पुरी ताकत झोंक कर इस गाना को गयीं हैं सर ..... अति सुंदर ... जय हिंद !!!!!

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  6. maa ek satya hai.....rishto ka., sneh ka...anvarat nischhal prem ka....! sahaj anubhuti hai ishwariy satta ki...! ek vijay hai aastikta ki naastikta par...! maa bas maa hai...har shabd se pare...har taarif se pare.... har wajah se pare....bas maa...! sundar lekhan ke liye dil se shubhkamana........!

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  7. maa toh satya hai...sahaj prem ki...sneh ki.., rishto ki..,anvarat nischal saadhna ki....! maa ek vishwaas hai dharti par ishwariy satta ki...., ek vijay hai naatikata par aastikta ki....! maa bas maa hai....shabd se pare..., tarif se pare....,! iss sundar lekhni ke liye dil se shubhkamana......!

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  8. बहुत सुंदर भाव लिए रचना |बधाई
    आशा

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  9. माँ ...पता नहीं इसके क़दमों के नीचे स्वर्ग होता है कि नहीं ...बस यह जानती हूँ कि सारी दुःख तकलीफ को समेट कर अपने बच्चों के लिये जीती है मां ...मेरी मां..
    गीत सुन्दर लगा ...!!

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  10. आज जहाँ साया-ए-मातम है, कल वो घर खुशियों से गुलजार होगा,
    जिन दगा-गरों के सितम का है वो शिकार हुआ, कल वही दागदार होगा।
    कहते हैं वक्त सबसे बड़ा मरहम है, उसी के असर का इंतजार करें,
    सबसे बड़ा सहारा तो माँ है, क्यूँ ना उसी माँ को याद करें।।

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  11. देह में जमने लगी
    बहती नदी है
    सांस लेने में लगी पूरी सदी है,
    चेतना पर धुंध छाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

    हम गगन में है
    न धरती पर
    बस हवाओं में हवाएँ हैं,
    धूप की कुछ गुनगुनी किरनें,
    ये तुम्हारी ही दुआएँ हैं,
    कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं,
    किंतु मन के तार सब अवगुन रहे हैं,
    गोद में सिर रख ज़रा सो लूँ,
    फिर जनमभर रत-जगाई है।
    माँ तुम्हारी याद आई है''!!!

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  12. sir.....apka ye geet sun kar aisa laga ki rafi sahab jivit ho uthe he....aapki rachna aur geet dono hi apritam ewm anupam he....

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  13. बहुत भाव पूर्ण रचना |बधाई
    आशा

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