बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

रोशन चिरागों को बचाता हूँ...



कभी खुद मैं ही बन कर आँधियां दीपक बुझाता हूँ.
कभी फानूस बन, रोशन चिरागों को बचाता हूँ.
अंधेरा भी कभी बनकर सुलाता हूँ जहाँ को मैं,
मैं ही बन रोशनी सूरज की,गुलशन को सजाता हूँ.


© अरविंद पाण्डेय

3 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं ही बन रौशनी,गुलशन को सजाता हूँ |" प्रशंस्निये रचना |आप कृपया मेरे ब्लॉग पर दस्तक दें ,आप की प्रतिक्रिया मेरा मार्गदर्शन करेगी ,धन्यवाद |
    http//kumar2291937.blogspot.com

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  2. बहुत सुंदर भाव ....शायद यही जीवन चक्र है ...ऐसे ही भाव हम सभी के मन में उपजते रहते हैं .... ...कैसे अभिव्यक्ति दें यही कोशिश करते रहते हैं ...

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