मंगलवार, 9 अगस्त 2011

मगर,मै रुक नहीं सकता, मुझे मंजिल बुलाती है.



ॐ आमीन :

नशीली सी फिजाएं देख  मुझको ,मुस्कुराती  हैं.
बहुत मीठे सुरों में  मस्त  कोयल  गीत गाती है.
बड़ा  ही  खूबसूरत  है  मेरी राहो का हर गुलशन.
मगर,मै रुक नहीं सकता, मुझे मंजिल  बुलाती है.

अरविंद पाण्डेय

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  2. ...and miles to go befofe I sleep...
    bahut sunder ....

    http://anupamassukrity.blogspot.com/2011/08/blog-post_10.html

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  3. आपकी इतनी सुंदर कविता इस बात का सन्देश दे रही हैं की जरूर कुछ शुभ होने वाला हैं .....

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  4. वाह वाह वाह क्या बात है बहुत खूब जी :)

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  5. He gar houshle dil me to manzil pa hi jayenge ,Bulaye chahe ye Gulsan ya rahe Rok de kante he apna houshla itna ki roke ruk na payene ,wo manzil dikh raha mujhko he rahe thodi si tedhi magar zazba baha itna ki Manzil pa hi jayenge ! Madhur jab Mas ayega ,ki koyal geet gayegi khilenge bag me Gulsan hawa shahnayee gayegi, milenge dil se jab dilbar ki Manzil mil hi jayegi !Pranam!

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