सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मात्र मैं ही हूँ जग की शक्ति..


स्वप्न :पृष्ठ ९ 
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४५ 
''पूर्ण वसुधा में है परिकीर्ण,
दुःख-सम्मिश्रित सुख का जाल.
अतः,इनमे रहता जो तुल्य,
लांघता वह संसृति का जाल.''

४६ 
''सतत निस्पृहता से जो व्यक्ति,
नित्य करता रहता सत्कर्म.
वही है योगी की प्रतिमूर्ति,
उसी में बसा वास्तविक धर्म.''

४७ 
''हलाहल पीने के भी बाद,
बना रहता है जिसका स्वत्व.
महायोगी पशुपति के तुल्य,
प्राप्त करता है वही शिवत्व.''


४८ 
''कामना का आच्छादन भेद,
प्राप्त करता है नर,सत्त्व.
शीघ्र ही ताज माया निर्मोक,
जान लेता वह मेरा तत्त्व.''

४९  
''चतुर्दश विद्याओं के बीच,
एक मेरा स्वरुप है व्याप्त.
सतत विद्यार्जन में संलग्न,
मनुज मुझको करता है प्राप्त.''

५० 
''मात्र मैं ही हूँ जग की शक्ति,
शक्त जो होता है निष्काम.
सूर्य-मंडल को भी वह भेद,
देख लेता मत्पथ उद्दाम .''

५१ 
''याद रखना ये मेरे शब्द,
वत्स, हे मेरे प्रियतम शिष्य.
देख मचला जाता प्रत्यक्ष,
मोदमय तेरा कान्त भविष्य.''

५२ 
तभी वह मृदुला वत्सल मूर्ति,
हो गई सहसा अंतर्धान.
दानकर मुझे प्रेम-संलिप्त,
एक पावक समदृश  शुचि ज्ञान.

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स्वप्न शीर्षक  ५२ छंदों की इस काव्यमाला का यह अंतिम पुष्प था..

-- अरविंद पाण्डेय 

4 टिप्‍पणियां:

  1. amazing ....!!
    Please give the meaning of some difficult words used.It will save us a lot of time .thanks .

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  2. परम आदरणीय सर , अभी तक की आपकी सभी कविताओ में यह सर्वोतम हैं मेरी नजर में परन्तु "नित्य करता रहता सत्कर्म" फिर भी माँ मुझे शक्ति क्यों नहीं देती हैं ? क्या माँ के नज़र में हम ही सबसे बड़ा पापी हैं क्या ? ..... ...सादर

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  3. Arvind,its nice to have so many craetive faces of you.Poems written by you remind me of Shri Dinkar ji...
    aap par hamein garv hai.
    Vijuy

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  4. 52 छंदों की यह संरचना अद्भुत थी। आप ऐसे ही लिखते रहें।

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