बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

पहले मंदिर नहीं, करें पहले भारत-निर्माण.



श्रीरामभद्रः विजयते:


मिले  तर्क  से  परे ,तुम्हारे  होनें  की अनुभूति.
प्रतिपल,प्रतिपदार्थ में तुम हो-बस हो यही प्रतीति .
समय नहीं,अब कृपा करो अभिराम-रूप हे राम.
हर ध्वनि जो मैं सुनूं गूंजता हो उसमे बस ''राम''. 



राम तुम्हारा नाम लिए फिरते हैं जो बाज़ार..

मंदिर जिनकी राजनीति है,रामभक्ति व्यापार.
उन्हें कहो अब तुम्हीं,किसी की बात रहे ना मान.
पहले मंदिर नहीं  करें पहले  भारत-निर्माण.

शिला-शिला थी पावन जिसकी,जो आपका निवास.
खंड खंड कर उसे , दिया लाखों जन को संत्रास.
सत्ता में रह किया जिन्होंने पौरुष का  अपमान.
कंदहार में बेचा सारे भारत का अभिमान.

जिन्हें न चिंता राम-रूप मानव का हो उत्कर्ष.
कहीं,किसी को कष्ट नहीं हो, सब में हो बस हर्ष.
दैहिक,दैविक भौतिक तापों से समाज हो मुक्त.
राजनीति में वही तुम्हारा,करते, नाम,प्रयुक्त.

कह दो उनसे कण कण में तुम दीप रहे हो, राम !
कह दो उनसे हर मानव का हृदय तुम्हारा धाम .
कह दो-''मुस्लिम भी, ईसाई भी हैं मेरे पुत्र.
मंदिर जैसा मस्जिद भी है सबके लिए पवित्र.''

----अरविंद पाण्डेय

6 टिप्‍पणियां:

  1. It's an awesome composition worth reading times & again to find godly bliss in one's life.Aravind Ji is known for his passion & wisdom.He has proved himself to be a great poet,versatile singer, genious writer,good administrator & thinker.I can only pray to God for his very long & happy life.

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  2. Sundar bhaw ke saath ati uttam kaavya.

    Dharm ke thekedaron aur raaj satta lobhi rajnitigyon ne ishwar ko in mandiron aur maszidon ka kaidi samjh liyaa hai, jis tarah chaho unkaa istemaal karo. Inhe kyaa pataa ishwar to hriday roopi mandir me bastaa hai. jahaa unse milne ke liye aapko kisi prakaar ke chadhaawe ki bhi awashyaktaa nahin hai siwaay nirmal hriday ke

    Regards
    Fani Raj

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  3. Bahut hi khubsurti se apne humare manobhawon ko prakat kiya hai....
    apki rachnaien bilkul aam logon ki apni kahani lagti hai...
    wastav me hume Mandir/Masjid k jhagron se door rah k pahle desh nirmaan ki baat karni chahiye...
    humara sukh,shanti or bhawisya sab aapsi talmail pe hi nirbhar hai...
    apki har rachna ek alag hi nayapan or yatharth ke utne hi karib hoti hai...
    wastav me humare desh ko in choti-2 baaton se uper uth k pragati ki or dekhna chahiye...
    na sirf apki kvitaien balki aapka gayan bhi lajawab hai...
    aap utne hi safal officer hain jitne behtarin insan hain.
    jitne aache lekhak hain utne hi aache chintak bhi hain...
    mai aapki har rachna or gayan ka intzar karta rahta hoon...
    nandita ji ne bhi kafi aacha gaya tha...
    kafi aachi lagi unki gayaki bhi...
    unki bhi or kuch nai album/gana ho 2 jarur link de hume...
    wastav me aap hum sab k Adarsh hain...
    Jai hind sir

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  4. 'मंदिर जिनकी राजनीति है,रामभक्ति व्यापार'.
    सही कटाक्ष किया है.
    कविता बहुत ही अच्छी है एक अच्छा सन्देश देती हुई..
    इस वाक्य में जहाँ आह्वान है और कवि का गहन चिंतन भी ,
    'पहले मंदिर नहीं करें पहले भारत-निर्माण'
    -शत प्रतिशत सहमत .

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  5. अति सुन्दर रचना , यथार्थपरक भी . अच्छा लगा . बधाई .

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