बुधवार, 20 जुलाई 2011

संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ ...



संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ 
यं यं व्यतीयाय पतिंवरा  सा.
नरेंद्र मार्गाट्ट इव प्रपेदे 
विवर्णभावं स स भूमिपालः

 
राजमार्ग-संचरण  कर  रही  दीप शिखा सी, इंदुमती.
वरण हेतु आए जिस वर को छोड़,बढ़ चली, मानवती.
उस नरेंद्र का हुआ मुदित मुखमंडल,सद्यः कांति-विहीन.
दीपशिखा-रथ बढ़ जाने से पथ-प्रासाद हुआ ज्यों दीन.

कालिदास की सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वरमणीय उपमा का उदाहरण- 
यह देवी इंदुमती के स्वयंवर का वर्णन है रघुवंश का. 
वे वरमाला लेकर वर के वरण हेतु संचरण कर रही हैं..............................शेष आप दृश्य को अपनी चेतना में रूपायित करें और  सहृदय-हृदय-संवेद्य रस-स्वरुप होकर , अलौकिक आनंद का भोग करे..


4 टिप्‍पणियां:

  1. कालिदास जी की काव्य रचना में भी इतना अच्छा विवरण नहीं होगा जितना आपके कविता में हैं "सहृदय-हृदय-संवेद्य रस-स्वरुप होकर , अलौकिक आनंद का भोग" परन्तु यह दैनिक जीवन में संभव नहीं दिखता हैं , आपकी संस्कृत तो अति उत्कृष्ट हैं ......

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  2. मै करता हूँ दैनिक जीवन में ही और आप साक्षी भी हैं...

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  3. परम आदरणीय सर , आप तो बहुमुखी प्रतिभा के प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं , उपरोक्त टिपण्णी हमने अपने जैसे साधारण व्यक्तियों के लिये लिखी हैं ....सादर .

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