सोमवार, 7 मार्च 2011

पितामह भीष्म द्वारा शर शैय्या पर की गई श्री कृष्ण की स्तुति : मेरे स्वर में.




ॐ कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

स्वर भी तुम हो शब्द भी.
ध्वनि भी तुम आकाश.
दृश्य तुम्हीं ,दर्शक तुम्हीं,
तम भी तुम्हीं प्रकाश ..

शर शैय्या पर भीष्म द्वारा श्री कृष्ण की स्तुति :
अपनी प्रतिज्ञा भंग करके, भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा की रक्षा करने के लिए भीष्म की ओर रथ का पहिया लेकर दौड़ते हुए भी भीष्म पर परम कृपा पूर्ण नेत्रों से करुणा की वर्षा करनेवाले श्री कृष्णचंद्र के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ ..
मुझे श्रीमद भागवत में, शर-शैय्या पर लेटे हुए पितामह भीष्म द्वारा ,श्री कृष्ण का दर्शन करते हुए,अपनी मृत्यु के समय की गयी श्रीकृष्ण की स्तुति अत्यंत प्रिय है जिसे पढ़कर रोमांच होने लगता है और आंसू बहने लगते है ..भीष्म के सम्मुख स्वस्थ.प्रसन्न श्री कृष्ण, पांडवों और अन्य ऋषियों के साथ खड़े थे ..अपने समक्ष उन्हें देखकर भी,भीष्म का मन. श्रीकृष्ण के उस रूप के चिंतन में तन्मय हो गया जो उन्हें अत्यंत प्रिय था ..

भीष्म की प्रेमपूर्ण वाणी भगवान की स्तुति करने लगी --
'' भगवान, त्रिभुवन-सुन्दर , तमाल-नीलवर्ण,रवि-रश्मि- उज्जवल,ज्योतिर्मय-पीताम्बर-परिधान,घुंघराली अलकों से सुशोभित मुखमंडल से सारी सृष्टि को आनंदित करनेवाले आप अर्जुन के सखा में मेरी प्रीती बनी रहे .युद्धभूमि में अश्वों के खुरों से उड़ती हुई धूलि से सनी हुई अलकें जिनके श्रीमुख के चारों  ओर छाई हुई है, मेरे तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच और जिनकी त्वचा छिन्न भिन्न हो गई है, वे श्री कृष्ण मेरे परम आराध्य हैं ..अपने सखा अर्जुन की बात सुनकर,अपने और शत्रुपक्ष की सेना के मध्य रथ लाकर खडा करके जो अपनी आँखों से ही शत्रुपक्ष की आयु का हरण कर रहे है --ऐसे पार्थसखा श्रीकृष्ण में मेरी प्रीति अविचल हो . .

सम्मुख उपस्थित सेना को देखकर,स्वजनों के संहार की आशंका से धर्मयुद्ध में दोषदृष्टि करते हुए युद्ध से विमुख होनेवाले अर्जुन की कुबुद्धि को जिन्होंने गीता के उपदेश द्वारा शुद्ध किया - वे महायोगी श्री कृष्ण मुझपर करुणा करते रहें ..

अपनी मर्यादा मिटाकर,मेरी प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए रथ से कूदकर, हाथी का वध करने के लिए दौड़ते सिंह की तरह मेरी ओर दौड़ते हुए श्रीकृष्ण के कोमल चरण मेरे चित्त में स्थिर बने रहें ..

मुझ आततायी के तीक्ष्ण बाणों से जिनका कवच फट गया था, जिनकी पूरी देह क्षत विक्षत हो गयी थी, जो मुझे मार देने का अभिनय करते हुए मेरी ओर दौड़े आ रहे थे ऐसे भगवान मुकुंद में मेरी शुद्धा भक्ति अविचल हो..

जिनकी ललित -गति, मंद-मुसकान,प्रेमपूर्ण दृष्टि से अत्यंत समानिता गोपियाँ उन्मत्त के समान उनकी लीलाओं का अनुकरण करती हुई उनमे तन्मय हो गई उन रसेश्वर श्री कृष्ण में मेरी परम प्रीति हो ..

----अरविंद पाण्डेय

8 टिप्‍पणियां:

  1. परम आदरणीय सर , आपने अपने आवाज़ में बहुत ही सुंदर स्तुति की हैं, आज पता नहीं क्यों आपकी स्तुति से मुझे लग रहा हैं कि आगे कुछ बहुत ही अच्छा परिवर्तन आने वाला हैं ......जय हिंद !!!

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  2. It's a wonderful account of Bhism Pitamah that he had uttered to Lord Krishna when the latter had come to pay his regards to that saintly person while he was counting his last and lying on death bed.. It amply proves that Bhism Pitamah had no malice against anybody what to talk of Lord Krishna whom he use to adore the most. I like this write-up very much and appreciate this ideal venture of Aravind Ji who is himself a great scholar of Sanskrit and well-versed of Shrimad Bhagwatam and Bhagwat Gita by reproducing those historical and mythological facts in a very simple language.

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  3. aadarniy sar
    bahuthi bhati may kar diya aapki is post ne.bahut achha laga main to do -teen baar padh gai .vastavme man ko behad bhai aapki prastuti
    sadar dhanyvaad sahit
    poonam

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  4. इस भक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति से अभिभूत हूँ।

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  5. इस भक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति से अभिभूत हूँ। धन्यवाद|

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  6. आपकी यह सुन्दर ज्ञानवर्धक भक्तिमय प्रस्तुति ... और आपकी आवाज में भीष्म पितामह की यह स्तुति बहुत अच्छी लगी .. कल यह चर्चामंच पर होगी... आप चर्चामंच पर आ कर अपनी विचारों से हम सबको अभिभूत करेंगे ..धन्यवाद ..

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  7. भक्तिभाव से परिपूर्ण अभिव्यक्ति।

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