रविवार, 23 मार्च 2014

भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम.


23 मार्च !! 

भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम................

नहीं शहादत देना है,  अब  तो  शहीद  करना है.
हिन्दुस्तां के रखवालों अब खुद न कभी मरना है.
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी को भूल,
कुछ  काले  अँगरेज़  भोंकते हैं भारत  को  शूल. 

इन्कलाब  का नारा  लेकिन इरविन  जैसा काम.
भगत ! बचो फांसी से,कर दो इनका काम तमाम.

अरविंद पाण्डेय www.biharbhakti.com

शनिवार, 22 मार्च 2014

इस ज़मीं से कोई खुशबू ले रहा, काँटा कोई.


दो तरह के पेड़ इक काँटों भरा, इक फूल का.
इस ज़मीं से कोई खुशबू ले रहा, काँटा कोई.
दो तरह के लोग हैं दुनिया के दस्तरख्वान में,
एक लगता मिर्च सा, दूजा लज़ीज़ इफ्तार सा .


अरविंद पाण्डेय 
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रविवार, 16 मार्च 2014

हमें है फिक्र कि होली में अम्नो-ओ-चैन रहे.

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

तुम्हें हसरत है कि होली में खूब रंग मलो,
हमें है फिक्र कि होली में अम्नो-ओ-चैन रहे.

तो फिर,कुछ इस तरह से लाल किसी को करना,
कि वो गुस्से में न हो लाल, न फिर बात बढे.

अरविंद पाण्डेय
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रविवार, 2 मार्च 2014

उन प्राणों की क्या चिंता

ॐ ,,,  आमीन 

न जायते म्रियते वा कदाचित् ...

क्षण क्षण क्षरण-शील जीवन में,
अनासक्त होकर तन-धन में,
केवल कर्म वही श्रेयस्कर 
जिससे हो सबका कल्याण.

उन प्राणों की क्या चिंता जो,
जन्म-जन्म से अविश्वस्त हैं,
तुम्हें छोड़कर निष्ठुरता से,
करते बारम्बार प्रयाण ...

अरविंद पाण्डेय www.biharbhakti.com

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

क्या कहें


किसी को गैस है इतनी कि पेट जलता है.
किसी की रोटियाँ बननी भी आज मुश्किल हैं..


अरविंद पाण्डेय 
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सोमवार, 27 जनवरी 2014

गण-तन्त्र सदा ही विजय करे.



गौरव से मस्तक उन्नत हो,
श्रद्धा से किन्तु सदा नत हो.

करुणा से हृदय प्रकाशित हो.
शुभ,शील,सत्य से प्रमुदित हो.

जन-गण में नव-उत्साह भरे.
गण-तन्त्र सदा ही विजय करे.
-- अरविन्द पाण्डेय 

गण-तंत्र दिवस की शुभ कामनाएं !!

अरविंद पाण्डेय
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बुधवार, 15 जनवरी 2014

कवि कुमार विश्वास के लिए एक कविता



कवि कुमार विश्वास के नाम एक कविता 




जब अनियंत्रित हो नदी,शिखर से बहती है.
फिर, कैसे बची रहेगी कलुषित धारों से .
निर्बंध महत्त्वाकांक्षा यदि उच्छल होगी ,
फिर 'आप' बचेंगें कैसे हेय विचारों से.

तब, जुबां बंद हो जायेगी उन मुद्दों पर,
जो भारत के जन-जन को विचलित करते है.
तुम विवश रहोगे और कहोगे फर्जी था 
जब वीर हमारे मुठभेड़ों में मरते हैं.

गर , कुर्सी की लपटों से कुछ ईमान बचा,
तो करो समर्थन अफ़ज़ल गुरु की फांसी का. 
गर, सच को सच कहने की ताकत नहीं बची,
फिर, नाम न लो कविता में झांसी रानी का .

अरविन्द पाण्डेय 

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सोमवार, 18 नवंबर 2013

और वो कंधा आज भी खून से लथपथ है.




कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो इंसान को मारने के लिए
उसे क्रिकेट की गेंद की तरह आसमान पे उछालते हैं.

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो आसमान से गिरते हुए 
उस इंसान को अपने कन्धों पे अस्पताल पहुंचाते हैं. 

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो गेंद की तरह उछाले जाते हुए
और अस्पताल में पड़े हुए उस इंसान को मुद्दा बनाते हैं.

कुछ लोग यहाँ ऐसे हैं जो इन दोनों तरह के इंसानों पर
फ़िल्में बनाकर पुरस्कार लेते हैं और करोड़ों कमाते हैं.

कोई मैदान में गेंद से खेलकर इन्सान को नचाता है .
कोई मैदान में अपनी जान पे खेलकर इंसान को बचाता है.

किसी के हाँथ में बैट और तमगे हैं,
किसी की जुबान पे सिसकती हुई शपथ है. 

मगर, वो इंसान आज भी अस्पताल में है 
और वो कंधा आज भी खून से लथपथ है. 


..............पटना के एस एस पी श्री मनु महाराज के उन अंगरक्षकों में से एक है मृत्युंजय यादव जो गांधी मैदान में हुए विस्फोट के उन साक्षियों में से हैं जिनके सामने तीन इंसान बम-विस्फोट के बाद ज़मीन से ऊपर की और उड़ गए जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है.... और उस वक्त भी पटना के पुलिस प्रमुख के साथ साथ उनके सारे अंगरक्षक वहां से हिले तक नहीं......वहां उपस्थित जन-समुदाय पुलिस वर्दी देखकर आक्रोशित हो उठा था किन्तु एस एस पी मनु महाराज और उन चार पुलिस के जवानों को अपनी चिंता नहीं थी ....वे चिंतित थे कि विस्फोट में घायल लोगों को तुरंत अस्पताल कैसे पहुचाया जाय ....ऐसे वक्त जब भीड़ उनके ऊपर घातक हिंसक हमला कर सकती थी तब भी उन्होंने घायलों को अपने कंधे पर उठाया और अस्पताल पहुचाया....
इन्हें किस पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाय..........ये जन-समुदाय निर्णय करे .......
.........इस फोटो में मृत्युंजय यादव गांधी मैदान के एक घायल को कंधे पे उठाये हुए अस्पताल की और बढ़ रहे हैं..........वहां उपस्थित बिहार के लोगों ने अद्भुत संयम दिखाया...घटना के बाद पुलिस के प्रति आक्रोश स्वाभाविक था फिर भी वहा शान्ति सुरक्षित रही.. धन्य है बिहार-भूमि और यहाँ के निवासी .......


..पटना पुलिस के जवान मृत्युंजय यादव को समर्पित...

अरविंद पाण्डेय

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रविवार, 3 नवंबर 2013

आओ, उन्हीं के नाम दिया पांच जलाएं.






दहशत के पटाखों में जो शहीद हो गए.
हाफ़िज़ की बेरुखी के जो शिकार हैं हुए.
आओ, उन्हीं के नाम दिया पांच जलाएं.
पुरअम्न-ओ-पुरअश्क़ दिवाली ये मनाएं.

अरविंद पाण्डेय
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शनिवार, 2 नवंबर 2013

दिया, खुद अपनी शहादत का, जलाया जाए.

 कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं 



तरह  तरह के बिक रहे  हैं चिरागान  यहाँ.
जिन्हें  खरीदने  को  लोग  परेशान  यहाँ.
 कोई चिराग ना मिला कि जो दिल खुश कर दे.  
सदी की स्याह सियासत में  रोशनी  भर दे.

तो आओ दोस्त, सियासत को जगाया जाए 
दिया, खुद अपनी शहादत का,  जलाया जाए.

Aravind Pandey 

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