सोमवार, 11 अप्रैल 2011

स्वप्न-चलचित्र चला तब चारु.

स्वप्न :पृष्ठ 3
११ 
विश्व-विजयी निद्रा से ग्रस्त,
सो रहे थे कुछ नर, जग भूल.
प्रिया-विरहित कुछ दुखित मनुष्य,
सहन करते थे उर में शूल.

१२ 
कल्पना का यह सुन्दर लोक,
देखकर मन था अति सानन्द.
कि सहसा, निद्रा-सुख अनुरक्त.
हो गईं मेरी आँखें बंद.

१३ 
स्वप्न-चलचित्र चला तब चारु,
झर रहा था प्रमोद-पानीय.
दृश्य जो देखा रुचिर नितांत,
नहीं है वह वाणी कथनीय.

१४ 
एक विस्तीर्ण क्षेत्र के मध्य ,
खडा मैं किंकर्तव्य विमूढ़.
देखता था होकर साश्चर्य,
प्रकृति का वह परिवर्तन गूढ़.

१५ 
वहां के कण कण में थी व्याप्त,
सत्त्व-गुण सर्जक गैरिक कान्ति.
शून्य में अतुल शून्यता तुल्य,
चतुर्दिक फ़ैली थी शुभ शान्ति.

क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 



रविवार, 10 अप्रैल 2011

सप्तऋषि का प्रशांत आलोक.

स्वप्न :पृष्ठ २ 
६ 
धरा का करता था श्रृंगार,
चंद्रिका का सुन्दर विक्षेप.
यथा ,करती है इश्वर-भक्ति,
बुद्धि पर सत्त्व-वृत्ति का लेप.
७ 
निशा-मंडित अनंत-श्रृंगार 
कर रहे थे तारक के पुंज.
वासनामय अंतर के बीच,
खिल रहा हो ज्यों प्रभु-रति-कुञ्ज.
८ 
कर रहा था विलसित ईशान,
सप्तऋषि  का प्रशांत आलोक.
सप्त-सुर ज्यों हों तप में मग्न,
छोड़, सुख का दुरंत निर्मोक.

९ 
शांत रजनी में सभी मनुष्य ,
चाहते थे सुख का संयोग.
रसिक, रति में थे अति सलग्न ,
सिद्ध करते थे योगी, योग.

१० 
जागरण-रत कविवृन्द  अजस्र ,
काव्य-रस पीने में थे मस्त.
काममय मर्त्य प्रिया-परिधान,
कर रहे थे नित अस्तव्यस्त .

क्रमशः 

यह  पांच छंद-समूह, कल से प्रारंभित, मेरी स्वप्न शीर्षक  लंबी कविता का द्वितीय प्रक्रम है ..एक बार , स्वामी विवेकानन्द और अपने संबंधो के विषय में चर्चा करते हुए  भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस ने बताया था कि स्वामी विवेकानन्द सप्तर्षियों में से एक ऋषि थे जिन्होंने श्री भगवान के आदेश पर, मानव रूप में जन्म लिया  था.एवं स्वयं श्री रामकृष्ण परमहंस ईश्वरावतार थे..आज की कविता में सप्तर्षि का उल्लेख था और इससे सम्बंधित छंद लिखते समय स्वामी जी का स्मरण हुआ तो उन्ही का चित्र इस कविता के साथ संसक्त कर दिया है..

-- अरविंद पाण्डेय 


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

निशा का मनमोहक सौन्दर्य


स्वप्न :पृष्ठ १  


१ 
ललित रजनी का मृदु परिरंभ, 
ले रहे थे समोद शशकांत .
यथा नारी को भोग्या मान,
रमण करता है मानव, भ्रान्त.
२ 
कुमुद के विकसित सुन्दर पुष्प,
कौमुदी का पाकर संयोग,
मधुर यौवन रस का साह्लाद, 
कर रहे थे अशंक उपभोग.
भूलकर अपना निकट भविष्य,
वासना के सागर में मग्न.
शीघ्र ही तल-स्पर्श के हेतु,
कुमुद, शशि थे प्रयत्न-संलग्न.
४ 
निशा का मनमोहक सौन्दर्य,
पी रहे थे रसमय रजनीश .
यथा माया आकर्ष देख,
भूल जाता है नर को ईश.
५ 
प्रकृति को पाणि-पाश में बाँध ,
चपल शीतल सुरभित पवमान .
प्रणय में अन्य कर्म को भूल,
सतत करता था सुमधुर गान.

क्रमशः 



५२ छंदों  में लिखी गई '' स्वप्न '' शीर्षक यह  कविता मैंने २/४/१९७९ से प्रारम्भ कर ८/४/१९७९ को पूर्ण की थी.यह मेरे एक स्वप्न-दर्शन पर आधारित है..जिसको मैंने अक्षरशः सत्य घटित होते हुए पाया है.उस समय मै , कालिदास , भारवि, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त,पन्त, निराला , महादेवी आदि कवियों का साहित्य नियमित पढ़ रहा था..और मेरे मन में, कविता को उसी रूप में सृजित करने की प्रेरणा होती थी जो संकृत की गंगोत्री से प्रवाहित शास्त्रीय हिन्दी के रूप में  अभिरूप पदों से सुमधुर हो ..
इसमे मेरी शैली, मुझे  हिन्दी-कविता के उस स्वर्णयुग का स्मरण कराती  है जब हम यह  कह सकते थे कि हिन्दी कविता भी विश्व-कविता की पंक्ति में , समान स्थिति में, ,स्वाभिमान के साथ, अपनी उपस्थिति का बोध करा सकती है.

यह कविता , प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में सम्मिलित है..

-- अरविंद पाण्डेय 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़,मधु यावत् पिवाम्यहं.


गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ , मधु यावत् पिवाम्यहं.
मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिश्यन्त्याशु  देवताः 

(श्री दुर्गासप्तशती में  जगन्माता का वचन )
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जब ऋत का सुरभित स्वर्ण कमल खिलता है.
जब अजा और अनजा का ध्रुव मिलता है.
जब भेद, ज्ञान-अज्ञान बीच मिटता है.
तब महाकालिका का नर्तन दिखता है.


जब प्रभा पिघलकर, धरा सिक्त करती है.
जब धरा , वाष्प बन शून्य-गगन भरती है.
जब पुष्प-गन्ध, बादल बनकर झरती है.
तब कृष्णा , चिन्मय नृत्य मधुर करती हैं.

जब प्रकृति-पुरुषमय जगत शून्य होता है.
जब निरानन्द , आनन्द-रूप होता है.
जब , अविज्ञान , विज्ञान-तुल्य होता है.
तब. जगदम्बा का कमल-नयन खिलता है.

जब वेद-अवेद-भेद का भ्रम कट जाता 
जब महासिन्धु , बस एक विन्दु बन जाता 
जब एक विन्दु , बन महासिन्धु लहराता.
तब ब्रह्मचारिणी का प्रकाश-घन छाता.


--- अरविंद पाण्डेय 


मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

शिव सुन्दर सहस्र - दल पद्म.


द्वितीयं ब्रह्मचारिणी 
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करोतु श्रीविन्ध्यनिवासिनी शुभं 
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कनक-कमल-किसलय के पुट में,
माँ ! रख,  रवि का अरुणिम रंग.
ह्रदय-पटल पर मैं खीचूँगा ,
तेरा करुणामय मुख - अंग .

विश्व कहेगा तब विस्मय से ,
अहा प्राणमय यह नव-चित्र .
कब, कैसे तुमने खींचा है ,
कहो , कहो,  हे मेरे मित्र.

तब तो अपने विश्व-रूप का
कथन,  सत्य करने के हेतु.
निज-मंदिर से मेरे उर तक.
माँ , तुम रचित करोगी सेतु.

मेरा, चिर- सुषुप्ति से विजड़ित,
शिव सुन्दर सहस्र - दल पद्म.
माँ, तेरे चिन्मय विलास का,
बन जाएगा शाश्वत सद्म.




  स्वर्णिम-स्वप्न-मयी कल्पना से सुगन्धित माँ की यह स्तुति मैंने १०/०६/१९८३ को जगन्माता को अर्पित की थी जो मेरी पुस्तक '' स्वप्न और यथार्थ '' में प्रकाशित है..आज नवरात्र महापर्व की द्वितीया को पुनः माँ के चरणों में समर्पित करता हूँ..

-- अरविंद पाण्डेय.

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

काली के तब, मृदु-अधर गुनगुनाते हैं.


प्रथम-दिवस नवरात्र का.

ॐ 

विन्ध्यस्थां विन्ध्यनिलयां विन्ध्यपर्वतवासिनीं.
योगिनीं योगजननीं  चंडिकां प्रणमाम्यहं .

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जब  कण  कण अपने  कारण  में  मिलता  है .
अस्तित्व,  काल का भी,  जिस  क्षण हिलता है.
जब खंड खंड हो , देश, शेष  हो  जाता .
तब, जगदम्बा का मुक्त केश लहराता.

जब सूर्य, शून्य बनकर सत्ता-च्युत होता.
जब महाप्रलय-जल, कृष्ण-चरण को धोता.
जब द्वैत, दृश्य-द्रष्टा का  मिट जाता है.
तब, माँ के मुख पर मधुर हास्य  छाता है.

जब घन-प्रकाश, तम में परिणत होता है.
जब तम भी अपनी सत्ता खो देता है.
जब महाविष्णु भी निद्रित हो जाते हैं.
काली के तब, मृदु-अधर गुनगुनाते हैं.

जब, सारी पृथ्वी,  जल में घुल जाती है.
जब , जल-सत्ता, पावक में मिल जाती है.
जब, पावक भी, पवमान स्वयं बनता है .
तब, महाप्रकृति का कमल-नयन खिलता है.

--  अरविंद पाण्डेय 

रविवार, 3 अप्रैल 2011

..अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.



इस विश्व-कप का जश्न तब मनेगा मेरे घर.
अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.
अफ़ज़ल,कसाब हैं असल जांबाज़ बल्लेबाज़.
जो, कर सको, करो ज़रा इनको भी कुछ नासाज़ .

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एक ''मैच'' था हुआ कारगिल में, पहले कुछ साल.
गिरे पांच सौ ''विकेट'' हमारे, धरती पूरी लाल.
''मैच'' हुआ फिर ''फिक्स'',और दोनों दल थे खुशबख्त .
दिया बहत्तर घंटे तक वापस होने का वक्त.


अफ़ज़ल और कसाब उन्हीं के ऐसे ''बल्लेबाज़''.
''विकेट'',जिन्हें दो सौ तक का,लेने का अब भी नाज़.
मगर उन्हें '' बाहर '' करने के खतरे का जो मोल,
कैसे, कौन चुकाए, हैं खामोश सभी के बोल.


इसी तरह, अक्साईचिन का ''क्रिकेट मैच'' हम हारे.
बासठ में चीनी सेना के हाथों बने बेचारे.
सैन्य-कारखाने में बनना बंद हुआ हथियार .
युद्धाभ्यास छोड़, हमने था किया शांति-व्यापार.


पञ्चशील के भ्रम में, जब हम शान्ति सहित सोते थे.
उसी समय, उनके सैनिक , हथियारों को ढोते थे.
तभी, अचानक ''मैच'' हुआ घोषित चीनी सेना का .
 क्रीडा-दक्ष सजग हो खेला करता सदा शलाका.

हम तो  खुदमुख्तार और आज़ाद वतन कहलाते.
पर, अपनी ही सीमा पर, जब जब भी, हम हैं जाते.
पूछा करते हैं अधिकारी अपने दोस्त वतन के.  
''अरुणाचल में क्यों प्रधानमंत्री आये भारत के .''


यहाँ सभी हैं विकेट,क्रिकेट, बल्लेबाजी में अटके.
ताकतवर बनने का रास्ता छोड़, नौजवां भटके.
और,श्रेष्ठ रहनुमा यहाँ छल-छद्मों में मशगूल.
ताज,मुंबई,कन्दहार,संसद हमले को भूल.
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जिस मुल्क में गेंदों से  जीतने पे जश्न हो.
कंधार-कारगिल पे, पर, कोई न प्रश्न हो.
उस मुल्क की मासूमियत को देख, देख कर .
दहशत-पसंद दिल को भला, क्यूँ न तश्न हो.


- अरविंद पाण्डेय        

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

इसी के नूर में श्री कृष्ण ने गीता थी कही..



मिटेगी सल्तनत, फटेगा आसमां इक दिन .
ये  शम्स ,चाँद सितारे बुझे बुझे होंगें. 
अगर बचेगा तो ईमान , आखिरत के दिन.
अगर  बचा सके उसे, तो, बच सकोगे तुम.

इसी के नूर में  श्री कृष्ण ने गीता थी कही.
इसी की रोशनी में आयतें उतरीं थीं कभी.
कुरआन , बाइबिल भी बस इसी से रोशन है.
इसी दरिया से कभी वेद  की ऋचा थी बही 


- अरविंद पाण्डेय

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.




तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.

मृदु वसंत की शांत,सुशीतल पवन का मिले अभिनन्दन.
व्याकुलता-परिपूर्ण हृदय में अब हो ईश्वर का वंदन.
भेद, भीति ,भ्रम से विमुक्त हो सबका शिव-संकल्पित मन.
दिव्य-दीप्ति से दीपित देखे प्रतिजन, प्रतिपल ही प्रतिकण .

- अरविंद पाण्डेय

सोमवार, 28 मार्च 2011

रहता ज़मीं पे, दास्ताँ, आस्मां की लिखता हूँ.



शायर हूँ मैं , गुज़रे बिना भी देख सकता हूँ.
रहता ज़मीं  पे, दास्ताँ, आस्मां की  लिखता हूँ.
चलते हैं सूरज ,चाँद भी मेरे इशारों पर.
तुमको  मगर इंसान का हमशक्ल दिखता हूँ.


- अरविंद पाण्डेय