बुधवार, 20 मार्च 2013

ढलेंगें हम न कभी,हमको यूँ ही चलना है




चरैवेति 
अगर अवाम के तन पर नहीं कपडे होंगे
अगर गरीब हिन्दुस्तान के भूखे होंगे
समझ लो फिर ये आज़ादी अभी अधूरी है
अभी मंजिल में और हममे बहुत दूरी है

हो सुबह,रात हो या गर्म दुपहरी की तपिश
हमें हर हाल में मंजिल की ओर बढ़ना है 
ढले महताब, सितारे या शम्स ढल जाए
ढलेंगें हम न कभी,हमको यूँ ही चलना है



अरविंद पाण्डेय
 www.biharbhakti.com

1 टिप्पणी:

  1. परिभाषायें कभी कमजोर न पड़ें हमारी, भले ही असफल कहलाये जायें हम।

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