गुरुवार, 22 नवंबर 2012

एकमेव है चन्द्र किन्तु शत - शत बन इतराता है,



महाकाश,  उत्फुल्ल - धवल  सागर  सा लहराता  है.
एकमेव  है चन्द्र किन्तु  शत - शत  बन  इतराता है.

रात्रि गहन, कल-कल, छल-छल चेतना बही जाती है.
है   सुषुप्ति  का  द्वार खुला  निद्रा  अब  गहराती है.

स्वप्न-हीन हो निशा, दिवस  में  स्वप्न  बनें साकार.
आओ  ,  ऐसा  ही  अद्भुत   हम ,   रचें    एक संसार.



अरविंद पाण्डेय 

3 टिप्‍पणियां:

  1. क्या खूब लिखा है आपने । रचना अच्छी लगी। असीम शुभकामनाएं। -- मिलन सिन्हा

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