रविवार, 11 सितंबर 2011

ईश्वर ऩे है दिया सभी को,दिव्य गगन का राज्य प्रशस्त.


ईश्वर ऩे है दिया सभी को,
दिव्य गगन का  राज्य प्रशस्त.
किन्तु,लोग कलुषित,क्षण-भंगुर
क्षुद्र  वस्तु  में  हैं  आसक्त. 

प्रतिदिन सविता सस्मित,सादर 
जिसे  बुलाता  अम्बर में 
वही मनुज है अविश्वस्त में 
व्यस्त, न्यस्त  आडम्बर में.

-- अरविंद पाण्डेय 

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3 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी विशालता को पहचानने में न जाने कितना समय लगता है लोगों को।

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  2. ईश्वर की बहुत ही सत्य और अच्छी वर्णन से भरी हुई कविता.....

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