शनिवार, 16 जुलाई 2011

बहने न दो सड़को की तपिश में मेरा लहू.


बहने न दो सड़को की तपिश में मेरा लहू.
ग़र ये गरम हुआ तो फिर तुम भी न जिओगे.
हम दिख रहे अभी तुम्हे बेबस, गिरे हुए.
ग़र उठ गए,फिर,भाग के भी बच न सकोगे.

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही जबरदस्त रक्तभरी कविता हैं ......

    उत्तर देंहटाएं
  3. ईश्वर का प्रथम नाम कवि है.. और मनुष्य, ईश्वर के सर्वाधिक निकट तब होता है जब उसमें कवित्व का आलोक, तरल होकर स्वर्णिम-सलिल सदृश उच्छल हो उठता है..विश्व इतिहास को प्रभावित करने वाली सभी क्रांतियों की पृष्ठभूमि '' कविता'' ने ही तैयार की. यह कवित्व ही है जो घने अन्धकार में भी प्रकाश का विश्वास बनाए रखता है...और शांत होकर, प्रकाश की प्रतीक्षा कर सकता है.इसलिए कवि की सत्ता सार्वभौम एवं सर्वोच्च है.....
    ...बहुत सुंदर।

    उत्तर देंहटाएं

आप यहाँ अपने विचार अंकित कर सकते हैं..
हमें प्रसन्नता होगी...