बुधवार, 13 अप्रैल 2011

पुष्प-परिमल-सुरभित पवमान


स्वप्न :पृष्ठ ४ 
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१६ 
पुष्प-परिमल-सुरभित पवमान ,
ह्रदय में करता था मद-सृष्टि.
अहा , वह मादकता भी आज,
सत्त्व-गुण की करती थी वृष्टि.

१७ 
एक शुचि-सलिला सरिता शांत,
बही जाती थी वहां सवेग.
हमें देती थी मानो सीख-
कभी मत रोको जीवन-वेग.

१८ 
फलाशा ईश्वर पर ही छोड़,
सदा हो स्वस्य-कृत्य में लीन.
प्रकृति फल देगी तुम्हें अवश्य,
वह सदा है अन्याय विहीन.

१९ 
एक धवलाम्बु-सरोवर मध्य,
खिले थे रक्त-सरोज सहस्र.
भक्त के उर में ज्यों प्रभु हेतु,
बह रहा हो अनुराग अजस्र .

२० 
पूर्ण- विकसित गुलाब के पुष्प,
प्रकट करते थे यही रहस्य.
''मनुज के जीवन का आनंद ,
नहीं रखता है केवल कश्य.

 क्रमशः 

-- अरविंद पाण्डेय 

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कश्य = शराब.
धवलाम्बु-सरोवर = स्वच्छ जल वाला तालाब.
अजस्र = निरन्तर
पुष्प-परिमल = फूलों की सुगंध.

4 टिप्‍पणियां:

  1. संग्रहणीय काव्य, अजब गहराई लिये हुये।

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  2. परम आदरणीय सर, बहुत ही अच्छी कविता हैं , हमें भी विश्वास हैं कि प्रकृति एक ना एक दिन जरूर ही फल देगी, प्रकृति सदा हैं अन्याय विहीन.....इसी आशा के साथ हम भी कर्म कर रहे हैं ...बस आप अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा सर ....सादर अभिवादन के साथ !!!!!

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  3. गहरी आस्था ...
    मनोरम दृश्य ....
    सुमधुर रचना .....
    badhai ...

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