बुधवार, 6 अप्रैल 2011

गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़,मधु यावत् पिवाम्यहं.


गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ , मधु यावत् पिवाम्यहं.
मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिश्यन्त्याशु  देवताः 

(श्री दुर्गासप्तशती में  जगन्माता का वचन )
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जब ऋत का सुरभित स्वर्ण कमल खिलता है.
जब अजा और अनजा का ध्रुव मिलता है.
जब भेद, ज्ञान-अज्ञान बीच मिटता है.
तब महाकालिका का नर्तन दिखता है.


जब प्रभा पिघलकर, धरा सिक्त करती है.
जब धरा , वाष्प बन शून्य-गगन भरती है.
जब पुष्प-गन्ध, बादल बनकर झरती है.
तब कृष्णा , चिन्मय नृत्य मधुर करती हैं.

जब प्रकृति-पुरुषमय जगत शून्य होता है.
जब निरानन्द , आनन्द-रूप होता है.
जब , अविज्ञान , विज्ञान-तुल्य होता है.
तब. जगदम्बा का कमल-नयन खिलता है.

जब वेद-अवेद-भेद का भ्रम कट जाता 
जब महासिन्धु , बस एक विन्दु बन जाता 
जब एक विन्दु , बन महासिन्धु लहराता.
तब ब्रह्मचारिणी का प्रकाश-घन छाता.


--- अरविंद पाण्डेय 


3 टिप्‍पणियां:

  1. वहाँ छिपी ऊर्जा अथाह जो,
    हम याचक, रह रह कर माँगे।

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  2. गहन अर्थ से भरी -
    ज्ञान का प्रकाश आलोकित करती हुई -
    अन्धकार का विनाश करती हुई
    उज्जवल रचना ....!!

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  3. " माँ श्री दुर्गासप्तशती " की अति सुदर रचना ......

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