रविवार, 3 अप्रैल 2011

..अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.



इस विश्व-कप का जश्न तब मनेगा मेरे घर.
अफज़ल का विकेट जब गिरे फांसी के तख़्त पर.
अफ़ज़ल,कसाब हैं असल जांबाज़ बल्लेबाज़.
जो, कर सको, करो ज़रा इनको भी कुछ नासाज़ .

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एक ''मैच'' था हुआ कारगिल में, पहले कुछ साल.
गिरे पांच सौ ''विकेट'' हमारे, धरती पूरी लाल.
''मैच'' हुआ फिर ''फिक्स'',और दोनों दल थे खुशबख्त .
दिया बहत्तर घंटे तक वापस होने का वक्त.


अफ़ज़ल और कसाब उन्हीं के ऐसे ''बल्लेबाज़''.
''विकेट'',जिन्हें दो सौ तक का,लेने का अब भी नाज़.
मगर उन्हें '' बाहर '' करने के खतरे का जो मोल,
कैसे, कौन चुकाए, हैं खामोश सभी के बोल.


इसी तरह, अक्साईचिन का ''क्रिकेट मैच'' हम हारे.
बासठ में चीनी सेना के हाथों बने बेचारे.
सैन्य-कारखाने में बनना बंद हुआ हथियार .
युद्धाभ्यास छोड़, हमने था किया शांति-व्यापार.


पञ्चशील के भ्रम में, जब हम शान्ति सहित सोते थे.
उसी समय, उनके सैनिक , हथियारों को ढोते थे.
तभी, अचानक ''मैच'' हुआ घोषित चीनी सेना का .
 क्रीडा-दक्ष सजग हो खेला करता सदा शलाका.

हम तो  खुदमुख्तार और आज़ाद वतन कहलाते.
पर, अपनी ही सीमा पर, जब जब भी, हम हैं जाते.
पूछा करते हैं अधिकारी अपने दोस्त वतन के.  
''अरुणाचल में क्यों प्रधानमंत्री आये भारत के .''


यहाँ सभी हैं विकेट,क्रिकेट, बल्लेबाजी में अटके.
ताकतवर बनने का रास्ता छोड़, नौजवां भटके.
और,श्रेष्ठ रहनुमा यहाँ छल-छद्मों में मशगूल.
ताज,मुंबई,कन्दहार,संसद हमले को भूल.
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जिस मुल्क में गेंदों से  जीतने पे जश्न हो.
कंधार-कारगिल पे, पर, कोई न प्रश्न हो.
उस मुल्क की मासूमियत को देख, देख कर .
दहशत-पसंद दिल को भला, क्यूँ न तश्न हो.


- अरविंद पाण्डेय        

13 टिप्‍पणियां:

  1. उनका भी विकेट गिरे तब होगी जीत पूरी देश की।

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  2. महायोगी की चिंता भारत माता से है जुड़ा,
    असली प्रश्न जब यक्ष बन सामने हो खड़ा .
    सबकी बोलती बंद हो जाती है क्यूँ भला,
    कब तक झूठी खुशियों पर बजेगी तबला ?

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  3. जिस मुल्क में गेंदों से जीतने पे जश्न हो.
    कंधार-कारगिल पे, पर, कोई न प्रश्न हो.
    उस मुल्क की मासूमियत को देख, देख कर .
    दहशत-पसंद को यूँ भला क्यूँ न तश्न हो.

    विश्व कप की जीत यूँ तो जश्न मनाने लायक है ...पर देश क्रिकेट से नहीं चलता ...बहुत सार्थक चिंतन ..

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  4. बहुत खूब. यही कामनाएं तो हर मन में हैं.

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  5. परम आदरणीय सर, आपकी इस सुंदर कविता में ,आपका भाव देश के प्रति में बिलकुल स्पष्ट हैं सर , देर सबेर अफ़ज़ल,कसाब का विकेट तो भारत सरकार गिरा ही देगी , जय हिंद !!!!

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  6. जिस मुल्क में गेंदों से जीतने पे जश्न हो.
    कंधार-कारगिल पे, पर, कोई न प्रश्न हो.
    उस मुल्क की मासूमियत को देख, देख कर .
    दहशत-पसंद को यूँ भला क्यूँ न तश्न हो....

    सार्थक चिंतन जो प्रेरित करती है कि हम ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने वाली घटना को ज्यादा तव्वजो ना दें | अफजल और कसाब का भी विकेट गिरेगा, क्यूंकि इसके सिबा हुकमरानों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं...

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  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. कामना तो कर ही सकते हैं...

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  9. बिल्कुल सही बात कही है …………उसी दिन जश्न होगा असली तो……………दिल मे उतर गयी आपकी ये रचना और जो दर्द है वो हम भी उतना ही महसूस करते हैं जितना आप या आम जनता सिवाय सियासतदारों के।

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  10. Bahut khoob ... dil ke aakrosh ko shabd de diye hain aapne ...
    In nikamme raajnetaaon ke jaagne ka intezaar pata nahi kitne saalon se hai ...

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  11. Sir agar aap jaise officer milate rahenge is desh ko,
    to vo din bhi door nahi, aakhir gira hi denge kasab ko.

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