सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

जिसका हाथ थाम मैं पीता..



जिसको  मेरे  होठ  पिएँ,
वह ही कहलाती  है हाला.

जिसका हाथ थाम मैं पीता.
वह बनती साकी बाला.

खुद  को  ही, खुद से ही पीकर, 
जिस दर मैं, मदहोश, फिरूं.

दुनिया वाले उस दर को ही 
कहते हैं यह मधुशाला.
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ईश्वर को परम रमणीय रमणी की रूप में देखना और स्वयं को उनका प्रेमी मानते हुए मस्त रहना--यह , विश्व के समस्त दार्शनिक प्रस्थानो को फारसी शायर संतो की  विलक्षण देन है..जिसे हृदयंगम करना, अमृत बन जाने के समान  है..एवं, जिस पर ईश्वर की प्रेमपूर्ण कृपा होती है वही इसे हृदयंगम कर पायेगा.. 


----अरविंद पाण्डेय

6 टिप्‍पणियां:

  1. u'm speechless ..........
    words are floating like fragrance in the cosmos
    taking me nearer to the super soul with evry breath!!!

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  2. Most Respected Sir,...I am rating the above poet Super Outstanding.... Jai Hind !!!!!

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  3. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति |
    आशा

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  4. जबसे स्वयं से प्यार करना सीखा है , तबसे दूसरों से भी प्यार करना आ गया । बहुत से लोगों , वस्तुओं और प्रकृति से भी स्नेह हो गया । इन सभी विषयों पर सोचना ही 'हाला' के समान मदमस्त करने वाला लगने लगा और मुझे मेरा मस्तिष्क ही 'मुधुशाला' लगने लगा ।

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  5. खुद को ही, खुद से ही पीकर,
    जिस दर मैं, मदहोश, फिरूं.

    दुनिया वाले उस दर को ही
    कहते हैं यह मधुशाल
    waah bahut khoob rahi .

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