रविवार, 3 मई 2009

तुम मेरे सपनों की सीमा ...



मैं तुम्हारी देह को , खुशबू बनूँ , फ़िर छू के महकूँ ,
मैं तुम्हारे ह्रदय को, संगीत बन , , छूकर के बहकूँ ,

अब यही सपना मेरी आंखों में
हर पल तैरता है ,


तुम मेरे सपनों की सीमा
पर तुम्हें क्या ये पता है


----अरविंद पाण्डेय

16 टिप्‍पणियां:

  1. kya khoob kahaa hai

    तुम मेरे सपनों की सीमा

    पर तुम्हें क्या ये पता है

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  2. सुन्दर है... एकनिष्ठ. उन्हें
    पता चले दुआ करें हम सब...

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  3. सुन्दर है... एकनिष्ठ. उन्हें
    पता चले दुआ करें हम सब...

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  4. तुम मेरे सपनों की सीमा
    पर तुम्हें क्या ये पता है
    सुंदर अभिव्यक्ति

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  5. exellent poem ,sir..
    sidhe saral shabdo me ek bahut hi sundar kawita...

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  6. kafi rochak aur dil ko chune wali rachna hai...
    Sir meri shubhkamnayen apke sath hai aap age bhi hame apni manodgar,vyakt karte rahen?
    Regard,s

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  7. bahut achchi rachna h
    kafi dino ke baat koi dil ko choo gaya
    paryas sarahiniya h

    nirantar likhte rahe

    ishi subhkamana ke sath

    adwaria

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  8. ABHINANDAN CHAUDHARY7 मई 2009 को 5:19 pm

    VERY NICE POEM SIR ...

    THANKS FOR THIS PRECIOUS POEM ....

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  9. rspctd brthr,
    This is a very sweet poem. I like very much.Aapke dil se nikle short & sweet words DIL ki bhawna ko show karte hai.
    Thanks big brthr.

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  10. hare krishna ji,aapki yeh kavita toh ssdha mann hi chu leti hai

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